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गुरुवार, 9 सितंबर 2010

प्रकृति की गोद में...

जीवन की आपाधापी के बीच अगर कुछ पल प्रकृति के बीच बिताने को मिल जाएं तो ऐसा लगता है जैसे जन्नत मिल गई हो। और यदि मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले के गरोठ-भानपुरा क्षेत्र में पहुंच जाएं तो इस जन्नत के भरपूर दीदार किए जा सकते हैं। नौकरी के दरमियान पिछले दिनों झरना क्या मिला जैसे जीवन मिल गया। भानपुरा शहर के दूसरे छोर पर स्थित बड़ा महादेव की पहाड़ी से निकलता झरना पुरसुकून देता है। और जब आप इसके नज़दीक जाते हैं तो फिर वापस बचपन को हासिल कर लेते हैं। कुछ ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ।

बुधवार, 8 सितंबर 2010

...आज जब तुम पास नहीं हो

आज फिर मन कर रहा है बूंदों के साथ नाचें,
आज फिर मन कर रहा है दूर तक पैदल चला जाए,
आज फिर मन कर रहा है रोते हुए बच्चे को बहलाया जाए,
आज फिर मन कर रहा है कहीं दूर हो आया जाए,
आज फिर मन कर रहा है तुमसे खूब दिल्लगी की जाए,
...आज जब तुम पास नहीं हो,
खूब मन कर रहा है तुम्हारे पास होने को...

लियो के लिए...

आज तड़के पता नहीं क्यों छोटे बेटे पुराण ने ज़िद पकड़ ली कि उसे ब्रेकफास्ट में वेनिला पुडिंग ही चाहिए। भला हो ब्लू बर्ड रेडिमिक्स इंस्टंट पुडिंग का जिसके कारण एक घंटे में पुडिंग बना पाया। अब जबकि पुराण पुडिंग खा रहा है मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैंने सालों पहले पापा से जो आसमान के तारे मांगे थे वे पापा ने मेरी मुट्ठी में ...रख दिए हों, यह कहते हुए कि मुट्ठी खोली तो तारे वापस आसमान में टंग जाएंगे...

मंगलवार, 27 जुलाई 2010

हो सके तो माफ कर देना

वह पहला बर्थडे था तुम्हारा जब मैं नहीं आ सका
जब तुम पहली बार हाईकोर्ट गए
अपना पहला बड़ा केस लड़ने
मैं नहीं आ सका
जब तुमने अपना पहला बड़ा केस जीता
खुशियों में मैं शामिल नहीं हो सका
जब तुम्हारी शादी हुई
और तुम फेरों तक तकते रहे मेरी राह
तब भी मैं नहीं आ सका
जब तुम्हारे छोटे भाई निलेश की शादी हुई कसरावद से
और मैं इंदौर आई बरात में भी शामिल न हो सका
जब तुम्हारे यहां पहली संतान प्यारी बिटिया हुई
तब भी मैं इस खुशी में शरीक नहीं हो सका
मैं हर बार आना चाहता था
क्योंकि ये तमाम अवसर मेरे लिए भी उतने ही
महत्वपूर्ण थे जितने कि तुम्हारे लिए
मैं आज भी आना चाहता हूं तुम्हारे पास
पर अब जबकि मैं अपराधबोध से भरा हूं
और जानता हूं कि मेरे ये कृत्य
माफी के लायक नहीं हैं
फिर भी हो सके तो मुझे माफ कर देना बृजेश....

बुधवार, 21 जुलाई 2010

मेरा बचपन-1

जैसे कल ही की बात हो। अकसर हम दोनों आपस में लड़ते-झगड़ते और फिर थोड़ी देर बाद एक हो जाते जैसे कभी कोई विवाद हुआ ही न हो।
रोजाना 10-12 घंटे साथ बिताने के बाद भी दोनों एक-दूसरे को रोजाना ख़त लिखते और अकसर ये ख़त कई-कई पन्नों के होते। बाई-बाऊजी अकसर कुपित होते कि इनकी दोस्ती आखिर ऐसी-कैसी है कि दिनभर साथ होने के बाद रात में पढ़ाई करने की जगह दोनों एक-दूजे को चिट्ठियां लिखते रहते हैं।
ये उन दिनों की बात है जब समलैंगिक संबंधों के बारे में लोग कम ही जानते थे। ऐसा नहीं था कि लोगों को पता नहीं था लेकिन समलैंगिक संबंध तब बहुत कम लोगों में होते थे इसलिए अकसर ऐसे संबंधों के बारे में चर्चाएं न के बराबर होती थीं।
बाई अकसर यह सोचकर सुकून की सांस लेतीं कि उनके बेटे के दोस्त के साथ ऐसे-वैसे संबंध नहीं हैं। हालांकि सारा कसरावद महेंद्र और बृजेश की दोस्ती की मिसालें देते नहीं थकता था। दोनों जैसे एक-दूजे के लिए बने थे। महेंद्र के कदम घर से बाहर पड़ते तो सीधे बृजेश के घर जाकर ही थमते और ऐसा ही बृजेश के साथ भी था।
अकसर ऐसा भी होता कि दोंनों के हमउम्र उनमें ग़लतफ़हमियां पैदा करने की कोशिश करते लेकिन वे इन हरकतों में सफल नहीं हो पाते। इसकी सबसे बड़ी वज़ह तो यही थी कि दोनों एक-दूजे के खिलाफ कुछ भी सुनना ही नहीं चाहते। फिर भी यदि कोई कुछ कह भी देता तो दोनों आपस में बात कर सबकुछ क्लीयर कर लेते और सामनेवाले की हालत खराब हो जाती।
धीरे-धीरे दोनों ने हाईस्कूल में एडमिशन ले लिया। यहां भी दोनों पहली बेंच पर एकसाथ बैठते। एकसाथ सवाल हल करते और नहीं कर पाते तो एकसाथ डांट भी खाते। चाहे वे भौतिकी पढ़ाने वाले सोमानी सर हों या अंग्रेजी पढ़ाने वाले पटेल सर। सभी मानते थे कि दोनों की न केवल गहरी दोस्ती है वरन जैसे दोनों एकसाथ ही सांस भी लेते हैं।
फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि दोनों को अलग होना पड़ा। पूरा शहर जैसे इस बात से अचरज में था कि क्यों बृजेश बड़वानी से पढ़ेगा और क्यों महेंद्र खरगोन से। आखिर ऐसी कौन सी आफ़त आ गई कि दोनों को अलग होना पड़ रहा है।